पणजी में संत का पार्थिव 450 साल से सुरक्षित

 


क्रिसमस पर अबकी बार कोरोना का साया है, लेकिन देशभर के गिरजाघरों में प्रार्थना का दौर चलेगा। हालांकि, अलग-अलग गाइडलाइन जारी कर दी गई है। देश में कई ऐतिहासिक चर्च हैं, जिनके इतिहास के साथ उनकी स्थापना का किस्सा भी कम रोचक नहीं है।

रांची का गोस्सनर इवांजेलिकल लूथेरान चर्च झारखंड का पहला चर्च है। गोथिक शैली में बने इस गिरजाघर की भव्य इमारत देखने लायक है। स्थापना का श्रेय फादर गोस्सनर को जाता है। कहते हैं कि उस वक्त उन्होंने 13 हजार रुपए चर्च के निर्माण के लिए दान में दिया था। इस चर्च की नींव जर्मनी से रांची पहुंचे कुछ पादरियों ने 18 नवंबर 1851 को रखी। चर्च का संस्कार 1855 में हुआ था। इमारत जर्मन वास्तुकला का नमूना है। यहां एक जर्मन पाइप बाजा भी है। कर्मचारी विनय बताते हैं कि इसे बजाने के लिए खास प्रशिक्षण दिया जाता है।

चर्च का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही रोचक भी। 1857 के अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह शुरू होने पर गोस्सनर कलीसिया में मिशनरीज भी घिर गए। उस वक्त  गिरजाघर पर चार गोले दागे गए, लेकिन वह सुरक्षित रहा। हमले के निशान आज भी गिरजाघर के पश्चिमी द्वार पर देख सकते हैं। 1915 में विश्व युद्ध के समय जर्मनों को वापस अपने देश जाना पड़ा। तब चर्च की जिम्मेदारी छोटानागपुर के बिशप डॉ. फोस्स वेस्सकॉट को दिया गया। अब तक 30 फादर इस चर्च के प्रमुख बने हैं।

गोवा के पणजी में ऐसा चर्च है जहां क्रिश्चियन संत फ्रांसिस जेवियर का पार्थिव शरीर 450 साल से सुरक्षित है। 'बेसिलिका ऑफ बॉम जीसस' चर्च जहां हर साल देश-विदेश से हजारों टूरिस्ट आते हैं। जेवियर पहले सिपाही थे और इग्नाटियस लोयोला के स्टूडेंट रहे। पुर्तगाल के राजा जॉन थर्ड और उस वक्त के पोप ने जेसुइट मिशनरी बनाकर फ्रांसिस जेवियर को धर्म के प्रचार के लिए भारत भेजा था। कहते हैं कि जेवियर ने शव को गोवा में दफनाने की इच्छा जताई थी।



बताते हैं कि उन्हें दफनाया गया लेकिन कुछ साल बाद रोम से आए संतों ने कब्र से निकलवाकर दोबारा दफनाया। ऐसा तीसरी बार भी हुआ। हर बार संत का पार्थिव शरीर ताजा हालत में मिला। उनकी देह आज भी चर्च में है। गोवा के जर्नलिस्ट फ्रेडी अल्मेडा के मुताबिक, हर 10 साल में ये बॉडी दर्शनों के लिए रखी जाती है। 2014 में आखिरी बार इस बॉडी को दर्शन के लिए निकाला गया था। बॉडी को कांच के एक ताबूत में रखा गया है। आज भी ये बॉडी सड़ी नहीं है।

ग्वालियर शहर का सबसे पुराना फालका बाजार का संत जॉन महा गिरजाघर 1800 में बना। कैथलिक चर्च को ऑस्ट्रेलिया के जाने माने आर्किटेक्ट कर्नल माइकल फ्लोज ने बनाया। ऑस्ट्रेलिया से सिंधिया वंश के तत्कालीन महाराज जीवाजीराव ने महल के आर्किटेक्चर डिजाइन के लिए बुलाया था। जब वे यहां आए तो उन्होंने अपने परिवार के लिए प्रार्थना और रहने की जगह मांगी थी। तब वे फालका बाजार में रहे और यहीं पर इस महागिरजाकर का निर्माण किया।

एडवोकेट राजू फ्रांसिस ने बताया कि कर्नल माइकल फ्लोज विश्व के जाने माने आर्किटेक्ट इंजीनियर थे। महाराज चाहते थे कि वे उनके महल का आर्किटेक्चर लंदन के बकिंघम पैलेस जैसा बनाकर दें। काफी समय कर्नल को यहां ठहरना पड़ा, जिस कारण गिरजाघर भी बना। चर्च में दो अष्ठधातु के रियासत कालीन घंटे भी लगे हैं। रियासत की मोहर नाग का चिह्न भी है। कर्नल की एक मूर्ति जयविलास पैलेस म्यूजियम में है।

टलैंड के दो पादरी रेव्ह. स्टील और विलियम शूलब्रेड प्रभू यीशु के संदेशों को पहुंचाने के लिए मुंबई आ रहे थे। 1858 में जहाज से मुंबई बंदरगाह उतरे। उदयपुर के महाराणाओं ने उनकी मदद की। दोनों ने यात्रा बैलगाड़ी से शुरू की। खेराड़ी शिवगंज में 10 फरवरी 1859 को लीवर अबसीस के कारण रेव्ह. स्टील की मृत्यु हो गई। तब डॉ. विल्सन के साथ रेव्ह. शूलब्रेड ने आगे की यात्रा शुरू की।

3 मार्च 1859 को रेव्ह. विलियम शूलब्रेड रेलवे स्टेशन स्थित खारचिया पहुंचे। यहीं से 1859 में मिशनरी की शुरुआत हुई। रेव्ह. विलियम शूलब्रेड ने 3 मार्च 1860 को पहाड़ी पर चर्च की नींव रखी। 12 साल बाद 1872 में चर्च बनकर तैयार हुआ। प्रदेश के पहले मदर चर्च में 18 मन का पीतल का घंटा 1871 में लंदन से मंगवाया।


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