स्वतंत्रता सेनानी बिस्मिल का अंतिम संस्कार कैसे बदल गई तस्वीर


आज हम आपको उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के राप्ती नदी के तट पर स्थित राजघाट अंत्येष्टि स्थल की खासियत के बारे में बताने जा रहे हैं। आज जिस राजघाट अंत्येष्टि स्थल को आकर्षक रूप दिया जा रहा है उस स्थान पर आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का अंतिम संस्कार हुआ था। बता दें कि योगी आदित्यनाथ सांसद रहते राप्ती तट पर एक सुंदर घाट बनवाने का प्रयास कर रहे थे। जब वे मुख्यमंत्री बने तो इस कार्य की शुरूआत हुई। इसे रामघाट नाम दिया गया है। कोरोना संकट और बाढ़ की वजह से निर्माण की गति में बाधा आ गई। नए साल में इसका निर्माण कार्य पूरा हो जाएगा।

बता दें कि 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर जेल में जब स्वतंत्रता सेनानी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई थी, तो इस समाचार को सुनने के बाद काफी संख्या में लोग जेल के गेट पर इकट्ठा हो गए थे। जेल का मुख्य द्वार बंद ही रखा गया और फांसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंपा गया था।




20 दिसंबर को लाखों लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया था। इसके पहले घंटाघर के पास उनका पार्थिव शरीर लोगों के अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था। इसी वजह से गुरुकृपा संस्थान के संयोजक बृजेश कुमार त्रिपाठी पिछले कई वर्षों से राजघाट पर पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की याद में स्मृति स्थल बनवाने की मांग कर रहे हैं।


19 दिसंबर को पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई थी। उसके एक दिन पहले उनकी मुलाकात उनके माता-पिता से कराई गई थी। 18 दिसंबर 1927 को माता-पिता से अंतिम मुलाकात की और सोमवार 19 दिसंबर 1927 (पौष कृष्ण एकादशी विक्रमी सम्वत् 1984) को प्रात:काल 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फांसी दे दी गई थी। इसके पहले 16 दिसंबर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा का आखिरी अध्याय पूरा करके जेल से बाहर भिजवा दिया था।


बिस्मिल की अंत्येष्टि के बाद बाबा राघव दास ने देवरिया जिले के बरहज नामक स्थान पर ताम्रपात्र में उनकी अस्थियों को संचित कर एक चबूतरा जैसा स्मृति-स्थल बनवा दिया।