सीएम योगी नाराज अवैध निर्माण पर वसूली का खेल होगा फेल

 


गोरखपुर में अवैध निर्माण के नाम पर वसूली के खेल पर अब जल्द ही शिकंजा कसने की उम्मीद है। शहर में अवैध निर्माण और उसे लेकर गोरखपुर विकास प्राधिकरण की कार्रवाई के तरीके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नाराजगी जताते हुए सख्ती की है। उनके एक सवाल से ही गोरखपुर प्राधिकरण समेत प्रदेश के कई अन्य प्राधिकरण भी कटघरे में खड़े हो गए हैं।

गत दिवस वीडियो कांफ्रंसिंग के जरिए विकास प्राधिकरणों की समीक्षा के दौरान उन्होंने पूछा कि आखिर अभियंताओं को निर्माण कार्य के दौरान ही उसके अवैध या वैध होने की जानकारी क्यों नहीं हो पाती। जब कोई आवासीय या व्यावसायिक इमारत बनकर तैयार हो जाती है, तब ही क्यों नोटिस या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की जाती है। मुख्यमंत्री ने चेताया है कि प्राधिकरण अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव लाए, खासकर अभियंता वर्ना दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

अवैध निर्माण करने वालों को नोटिस जारी करने में जीडीए प्रदेश में दूसरे स्थान पर है। प्राधिकरण की ओर से अब तक करीब 22 हजार 400 नोटिस जारी किए जा चुके हैं। इन नोटिसों पर संतोषजनक जवाब न मिलने पर आगे की कार्रवाई भी हुई है। प्राधिकरण ने करीब 17500 से अधिक निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश भी दे दिया है। ये फाइलें ,अनुपालन का इंतजार कर रही हैं। इन पर कार्रवाई हुई तो शहर का बड़ा हिस्सा विरान हो जाएगा। कई मामले हाई कोर्ट में चल रहे हैं तो बाकी में स्टॉफ की कमी आदि की वजह से सालों से कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

जीडीए की ओर से जितनी नोटिस जारी की गई है, उनमें से ज्यादातर में ध्वस्तीकरण का आदेश है। करीब तीन हजार ऐसे निर्माण हैं, जिन्हें सील करने का आदेश जारी किया गया है। सीलिंग के आदेश वाली 2500 फाइलों को शमन के तहत वैध किया जा सकता है। नई शमन नीति के तहत इन्हें नोटिस देकर शमन कराने को कहा भी गया था। मगर इसी बीच कोर्ट से नई शमन नीति पर रोक लग गई। इसके चलते पुरानी शमन नीति के तहत भी सभी तरह की कार्रवाई बंद है।

इसे मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ ही प्रमुख सचिव आवास विकास को भी उसे उपलब्ध कराना होगा, ताकि जिम्मेदारी तय की जा सके। कमिश्नर ने 21 दिसंबर को इस संबंध में प्राधिकरण के सभी अफसरों की बैठक बुलाई है। निर्देश दिया है कि प्रत्येक परियोजना, अवैध निर्माण आदि से जुड़ी पूरी रिपोर्ट के साथ अफसर बैठक में उपस्थित होंगे।   

अवैध निर्माण के लिए जीडीए के अभियंता और अफसर तो जिम्मेदार हैं ही, प्राधिकरण क्षेत्र में आने वाली करीब 1700 एकड़ विनियमितीकरण की जमीन भी बड़ी वजह है। यहां हजारों मकान खड़े हो गए हैं। वर्तमान महायोजना 2021 में करीब 20 फीसदी एरिया को विनियमित क्षेत्र घोषित कर दिया गया था। यहां मानचित्र नहीं स्वीकृत हो सकते।

अभियंताओं और अफसरों की लापरवाही से इस विनियमित क्षेत्र में पिछले ढाई दशक में 12 हजार से अधिक निर्माण हो गए हैं। ये वर्तमान में कुल 22 हजार अवैध निर्माण के आधे से भी अधिक हैं। इनमें कुछ कॉलोनियां तो ग्रीन लैंड पर बस गई हैं। ये अवैध निर्माण जीडीए के लिए मुसीबत बन गए हैं। जीडीए अब अगर इन अवैध निर्माण के खिलाफ सख्ती करना भी चाहे तो कार्रवाई आसान नहीं होगी। मोहल्ले के मोहल्ले जमींदोज करने पड़ेंगे।

प्रदेश में अवैध निर्माण के मामले में दूसरे पायदान पर रहने का दाग, गोरखपुर के माथे से नई महायोजना में धुलने की उम्मीद है। प्राधिकरण नई महायोजना 2031 में इसके समाधान में जुटा है।  महायोजना 2031 में विनियमित क्षेत्र में बने घरों के मानचित्र भी स्वीकृत किए जाने का प्रावधान की तैयारी चल रही है। जनवरी तक इस महायोजना के पूरा होने की उम्मीद है।

करीब चार साल पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा अवैध निर्माण के साथ ही जीडीए द्वारा मानचित्र के सबसे ज्यादा 60 फीसदी आवेदन निरस्त करने के मामले में शासन ने एक जांच कमेटी गठित की थी। कमेटी के सदस्यों ने दो दिन यहां रहकर मामले की जांच की। जांच में पाया गया था कि विनियमितीकरण क्षेत्र के ज्यादातर आवेदन आने की वजह से निरस्त होने वाले आवेदनों की संख्या अधिक है। इस मामले में जीडीए को शासन की तरफ से उस समय राहत मिल गई थी।

मानचित्र के नाम पर घूस लेते प्राधिकरण की एक महिला कर्मचारी को पिछले साल एंटी करप्शन की टीम ने रंगो हाथ पकड़ा था। पूर्व उपाध्यक्ष अन्नावि दिनेश कुमार के निर्देश पर ही यह कार्रवाई हुई। कुछ अभियंताओं के भी नाम आए थे। यही नहीं विभिन्न मामलों में जीडीए दफ्तर से फाइलें गायब होने पर भी अब तक दो-तीन मुकदमे दर्ज हो चुके हैं।

अवैध निर्माण पर अब सबसे पहले अभियंताओं की जिम्मेदारी तय की जाएगी। यह सच है कि यदि कहीं पर अवैध निर्माण खड़ा हो गया, तो निर्माण के समय संबंधित अभियंता क्या कर रहे थे। करोड़ों की लागत से निर्माण पूरा हो जाने पर क्यों नोटिस, सीलबंदी या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की नौबत आती है।

इससे प्राधिकरण की छवि तो खराब हो ही रही, कोर्ट आदि में मामले जाने से श्रम, समय और धन भी खर्च होता है। मगर अब सख्ती की जाएगी। उन्होंने कहा कि कुछ लोग तो जनबूझकर अवैध निर्माण कराते हैं मगर बहुत से ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें कानून व नियमों की जानकारी नहीं होती, उन्हें यह जानकारी देने का काम भी प्राधिकरण का ही है।



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