नवसीखिये पत्रकार कर रहे पत्रकारिता का चीरहरण

*अजय कुमार श्रीवास्तव, कानपुर।।* जी हां आपने सही पढ़ा। सोशल मीडिया के आ जाने से पत्रकारों की बाढ़ आ गई हैं। हर आदमी किसी न किसी न्यूज़ पोर्टल, न्यूज़ वेबसाइट, यू ट्यूब चैनल का मालिक है। और बिना किसी रोक टोक के न्यूज़ पोर्टल और यू ट्यूब चैनल संचालित हो रहे है। जिसमे कोई समस्या नही है। समस्या तब जन्म लेती है जब इन न्यूज़ वेबसाइटों और यू ट्यूब चैनलों में प्रकाशित होने वाली सामग्री बिना एडिटर के ही प्रकाशित कर दी जाती है।

पहले आदमी पत्रकार होता था। और कुछ साल पत्रकारिता करने के बाद संपादक बनता था। अब पहले संपादक बनते है और बाद में पत्रकार बनते है।

माइक लेकर गली मोहल्लों में घूमते हैं। पत्रकारिता का रौब झाड़ते है। वसूली करते है। स्थानीय पुलिस थाने में दिनभर बैठते हैं। थानेदार से लेकर चौकी इंचार्ज तक एक नम्बर की सेटिंग बैठाते है। 

खबर भले ही न लिखना आये। सेल्फी एक नम्बर की लेते है। उसी सेल्फी से कमाई होती हैं।

बाकायदा गिरोह सक्रिय है वसुलीबाजो का। किसी भी हॉस्पिटल, स्कूल, रेस्टोरेंट, होटल आदि में पांच माइक आईडी लगाई, तमाम कमियां निकली, वीडियो बनाया और डील शुरू हुई वीडियो डिलीट करने के लिए। पांच छः हज़ार में फाइनल हो गया। शाम को दारू चखने का इंतजाम हुआ। हो गई पत्रकारिता। और गलती से उस जगह से पैसे नही मिले तो, फिर क्या व्हाट्सएप, फेसबुक पर शुरू हो गई पत्रकारिता। उससे भी मामला नही बना तो कर दिया ट्वीट। अगर गलती से अधिकारी ने लिख दिया कि मामले का सज्ञान लें।

तो फिर कहने क्या हो गये बड़का पत्रकार। दे दना दन स्क्रीन शॉट भेजा और हो गई वसूली।

बर्रा में ऐसे एक गिरोह पत्रकार के खिलाफ एक स्कूल प्रबंधन ने स्कूल में जाकर वीडियो बनाने और 50 हजार रुपये वसूली की रिपोर्ट दर्ज कराई। मामला सुर्खियों में आया। वसुलीबाजो का नाम भी सामने आया, पर चोर चोर मौसेरे भाई , लोगो ने ले देकर मामला निपटा दिया। बेचारा स्कूल संचालक भी क्या करता। स्कूल जो चलाना था।

ऐसे ही एक फ़ेसबुकिया पत्रकार उन्नाव में एक महिला नेता के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। रोज व्हाट्सएप और फेसबुक पर उसकी इज्जत को लगे तार तार करने।

कुछ दिन बाद वो दुनिया से गायब हो गए। जिनके साथ सेल्फी लेकर रौब झाड़ते थे। उन्ही पुलिस वालों ने बड़ी मेहनत से उनकी बॉडी को ढूंढ निकाला। पुलिस से पता चला उस महिला ने ही उन पत्रकार महोदय का काम तमाम कर दिया था।

पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो स्वतन्त्रता के पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्ति का लक्ष्य था। स्वतन्त्रता के लिए चले आंदोलन और स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने अहम और सार्थक भूमिका निभाई। उस दौर में पत्रकारिता ने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने के साथ-साथ पूरे समाज को स्वाधीनता की प्राप्ति के लक्ष्य से जोड़े रखा।

इंटरनेट और सूचना के आधिकार ने पत्रकारों और पत्रकारिता की धार को अत्यंत पैना बना दिया लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि पत्रकारिता की आड़ में इन हथियारों का इस्तेमाल ’ब्लैकमेलिंग' जैसे गलत उद्देश्य के लिए भी होने लगा है। समय-समय पर हुये कुछ ’स्टिंग ऑपरेशन' और कई बहुचर्चित सी. डी. कांड इसके उदाहरण हैं।

पत्रकारिता का अर्थ

पत्रकारिता शब्द अंग्रेजी के ‘जर्नलिज्म’ का हिन्दी रूपांतर है। ‘जर्नलिज्म’ शब्द ‘जर्नल’ से निर्मित है और इसका अर्थ है ‘दैनिकी’, ‘दैनंदिनी’, ‘रोजनामा’ अर्थात जिसमें दैनिक कार्यों का विवरण हो। आज जर्नल शब्द ‘मैगजीन’, ‘समाचार पत्र‘, ‘दैनिक अखबार’ का द्योतक हो गया है। ‘जर्नलिज्म’ यानी पत्रकारिता का अर्थ समाचार पत्र, पत्रिका से जुड़ा व्यवसाय, समाचार संकलन, लेखन, संपादन, प्रस्तुतीकरण, वितरण आदि होगा। 

आज के युग मे पत्रकारिता के अभी अनेक माध्यम हो गये हैं, जैसे-अखबार, पत्रिकाएँ, रेडियो, दूरदर्शन, वेब-पत्रकारिता, सोशल मीडिया, इंटरनेट आदि।

हिन्दी में भी पत्रकारिता का अर्थ भी लगभग यही है। ‘पत्र‘ से ‘पत्रकार’ और फिर ‘पत्रकारिता’ से इसे समझा जा सकता है। ‘पत्रकार’ का अर्थ समाचार पत्र का संपादक या लेखक। और ‘पत्रकारिता’ का अर्थ पत्रकार का काम या पेशा, समाचार के संपादन, समाचार इकट्ठे करने आदि का विवेचन करने वाली विद्या। 

कोई भी पेशेवर ईमानदारी से यह दावा नहीं कर सकता कि उसे पत्रकारिता का पर्याप्त अनुभव हो गया है और कि उसे अब अपने जीवन में कुछ सीखने की दरकार नहीं. जबकि सीखने-सिखाने का सिलसिला ता-उम्र चलता रहता है।

अगले सप्ताह फिर मुलाकात होगी। पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को लेकर।

( लेखक कानपुर देहात प्रेस क्लब के अध्यक्ष है। और ऑल मीडिया प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष है।)

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